Bhagat Singh History in Hindi | भगत सिंह की जीवनी

आज का हमारा आर्टिकल Bhagat Singh History in Hindi पर आधारित है।

भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान दिया। अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचार और गैर कानूनी नियमों से भारत का हर देशवासी तंग था और सभी यह चाहते थे कि भारत को अंग्रेजों से आजादी मिले।

भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए भारतीय द्वारा स्वतंत्रता संग्राम चलाया गया जिसमें एक तरफ अहिंसा से एवं दूसरी तरफ हिंसा का सहारा लेकर देश को आजाद कराया गया। हिंसा वाली सेना में भगत सिंह, मंगल पांडे, सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल थे तथा अहिंसा वाली सेना में महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू आदि स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे परंतु इन सब का उद्देश्य भारत से अंग्रेजों को बाहर करना ही था और भारत को आजाद करना था। 

भारत को आजादी दिलाने में हम भगत सिंह के अमूल्य योगदान को कभी नहीं भुला सकते हैं परंतु क्या आपको पता है कि भगत सिंह कौन थे और भगत सिंह का इतिहास क्या है (Bhagat Singh History in Hindi) अगर नहीं, तो हमारे आज के लिए के लेख के माध्यम से भगत सिंह से संबंधित जानकारी प्राप्त हो जाएगी। 

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Bhagat Singh History in Hindi | भगत सिंह का इतिहास

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को तत्कालिक पंजाब के जिले लायलपुर में हुआ था जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। भगत सिंह को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महान एवं शक्तिशाली क्रांतिकारी के रूप में जाना जाते हैं। अंग्रेजों द्वारा भारतवासियों पर सबसे क्रुर हमला जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह गंभीर रूप से प्रभावित हुए और उन्होंने भारत की आजादी के लिए नौजवानभारतसभा का गठन किया इसके लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई भी छोड़ दी‌।

साल 1922 में जब चोरा चोरी हत्याकांड में महात्मा गांधी ने किसानों को साथ नहीं दिया था उसके पश्चात भगत सिंह उनके इस फैसले से बहुत नाराज हुए और यह ठान लिया कि अंग्रेजों से भारत को आजाद करने के लिए केवल शस्त्र और हिंसा का सहारा ही एकमात्र मार्ग है। अब उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में गठित हुई ग़दर दल में शामिल होने का फैसला किया। अंग्रेजों के विरोध काकोरी कांड चलाया गया परंतु अंग्रेजी सरकार उस समय इतनी प्रभावशाली थी कि उस आंदोलन के फलस्वरुप सजा के तौर पर राम प्रसाद बिस्मिल तथा अन्य साथियों को फांसी की सजा सुना दी गई तथा अन्य को कारावास में डालने का आदेश दिया गया।

अंग्रेजों के इस हरकत से भगत सिंह इतने गुस्सा हुए कि वह चंद्रशेखर आजाद एवं अन्य साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में शामिल हो गए और अब उन्होंने इस एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रख दिया। इस एसोसिएशन का उद्देश्य देश के प्रति सेवा, त्याग एवं पीड़ा को अपनाना आदि था एवं इन्हीं विशेषताओं वाले युवकों को एसोसिएशन में शामिल करना था। 

अंग्रेजों की सभा साइमन कमीशन को बर्खास्त करने के  लिए साल 1928 में प्रदर्शन हुआ जिसमें लोगों को प्रदर्शन भाग से हटाने के लिए अंग्रेजों द्वारा लाठीचार्ज किया गया और इस लाठीचार्ज के दौरान लाठियों के वार से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह और राजगुरु ने एक गुप्त नीति बनाई और पुलिस के अध्यक्ष स्कॉट को मारने की रणनीति बनाई।

इस रणनीति के मुताबिक भगत सिंह एवं राजगुरु लाहौर को तावली के समक्ष सामान्य रूप से टहलने लगे और क्रांतिवीर गोपाल जी कोतवाली के सामने अपनी साइकिल को लेकर ऐसे खड़े हो गए जैसे कि उनकी साइकिल खराब हो गई हो परंतु जय गोपाल वहां पर भगत सिंह एवं राजगुरु को निर्देश देने के लिए बैठे हुए थे और पास में ही स्थित डीएवी स्कूल की दीवार के पीछे चंद्रशेखर आजाद हमला करने के लिए तत्पर थे। ‌

17 दिसंबर सन 1928 को करीब 4:15 बजे के आसपास जब एसएसपी सांडर्स कोतवाली से बाहर आए तो राजगुरु ने एक गोली सीधा उनके सर में मारी और भगत सिंह ने भी तीन चार गोली उसके सीने में दाग दी जब राजगुरु एवं भगत सिंह भागने लगे तो उनके पीछे एक सैनिक भी भागा परंतु चंद्रशेखर आजाद ने उसे चेतावनी दी कि आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा और आगे वह बढ़ा और जिसके फलस्वरूप चंद्रशेखर आजाद ने गोली चला दी और वह भी मारा गया। इस प्रकार यह गुप्त रणनीति सफल रही हो लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया। 

भगत सिंह ने 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु के सहयोग द्वारा लाहौर में पुलिस सहायक के अध्यक्ष जेपी सांडर्स को मार गिराया। क्रांतिवीर चंद्रशेखर आजाद ने उनके इस कदम में उनका भरपूर सहयोग दिया। इसके बाद भगत सिंह ने फैसला किया कि वह अपनी आवाज अंग्रेजों तक पहुंचेंगे और भले ही उसके लिए कोई भी दंड प्राप्त हो गए स्वीकार करेंगे। भगत सिंह एवं राजगुरु नई दिल्ली के लिए निकल पड़े।

भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर नई दिल्ली में अंग्रेजी सरकार को आश्वस्त करने के लिए संसद भवन में बम और पर्चे फेंके। भगत सिंह एवं राजगुरु ने उस तरफ बम फेंका जहां पर कोई भी आदमी उपस्थित ना हो जिससे किसी भी प्रकार की मानहानि ना हो। ‌ भगत सिंह पहले से ही  सोच कर आए थे कि बम एवं पर्चे फेंकने के बाद यह भागेंगे नहीं बल्कि सभी सजा को स्वीकार करेंगे और चाहे वह सजा फांसी की ही क्यों ना हो।

वह अपने स्थान पर खड़े रहे और “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा लगाने लगे और थोड़े समय बाद ही घर पर पुलिस आ गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया बाद में अंग्रेजी कार्रवाई के अनुसार भगत सिंह  राजगुरु फांसी की सजा दी गई। 

26 अगस्त 1930 को अदालत ने असेंबली के दौरान बम फेंकने तथा धारा 129 एवं 302 के तहत भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाने का प्रस्ताव जारी किया मगर अन्य भारतीय नेताओं तथा संरक्षकों द्वारा फांसी की सजा को माफ करने की अपील की गई क्योंकि इन क्रांतिवीरों ने भारत को अंग्रेजों याद दिलाने के लिए अपना सहयोग दिया था और कई तारीखों एवं कार्यवाही के तहत फांसी की सजा को माफ करने का सिलसिला चलता रहा परंतु अदालत के अंतिम फैसले के अनुसार 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दे दी गई। 

इस तरह भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिवीरों को वीरगति प्राप्त हुई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इन वीरों का नाम शान से लिया जाता है। भगत सिंह ने अपने इतिहास (bhagat singh history in Hindi) में कई वीरता से भरपूर रणनीतियों को अंजाम दिया और सफल भी रहे। 

निष्कर्ष

इस आर्टिकल में हमने आपको भगत सिंह के इतिहास (Bhagat Singh History in Hindi) से संबंधित जानकारी प्रदान की है।

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