आर्य समाज की स्थापना किसने की थी|आर्य समाज के 10 नियम क्या है?

आर्य समाज की स्थापना किसने की थी

आज का हमारा आर्टिकल आर्य समाज की स्थापना किसने की थी|Arya Samaj Ki Sthapna Kisne Ki Thi पर आधारित है।

भारत की आजादी से पहले यहां पर कई कुरीतियां थी जो पुराने समय से ही चली आ रही थी और बदलते जमाने के मुताबिक इन्हें खत्म करना जरूरी था। वह कुरीतियां सामाजिक रूप से फैली हुई थी और कुछ कुरीतियों का संबंध महिलाओं से था।

आर्य समाज की स्थापना किसने की थी

समाज की कुरीतियों को खत्म करने के लिए कई आंदोलन चलाए गए, परंतु आज हम आर्य समाज आंदोलन के बारे में बात करेंगें और जानेंगे कि आर्य समाज की स्थापना किसने की और आर्य समाज की महत्ता क्या है?

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आर्य समाज

समाज में फैली कुरीतियों को खत्म करने के लिए एक हिंदू सुधार आंदोलन चलाया गया जिसे आर्य समाज का नाम दिया गया। आर्य समाज की स्थापना दयानंद सरस्वती ने सन् 1875 महाराष्ट्र के शहर बम्बई (वर्तमान में मुम्बई) में की थी।

आर्य समाज अंधविश्वास, मूर्ति पूजा, झूठे कर्म काण्ड, अवतारवाद, बलि चढ़ाना आदि तत्वों को नकारता था। आर्य समाज का उद्देश्य समाज में समानता एवं महिलाओं व अनुसूचित जाति तथा जनजाति के प्रति छुआछूत और जातिगत भेदभाव को खत्म करना था।

आर्य समाज के अनुयायियों ने स्त्रियों तथा शुद्र को जनेऊ धारण करने का अधिकार भी प्रदान किया था। सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रंथ स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखा गया आर्य समाज का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

आर्य समाज के सिद्धांत

आर्य से तात्पर्य श्रेष्ठ और प्रगतिशील होता है। इसके फलस्वरूप आर्य समाज का सिद्धांत श्रेष्ठता और प्रगतिशीलता पर आधारित है। आर्य समाज के अनुयायी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और योगीराज श्री कृष्ण के आदर्शों पर चलते थे। आर्य समाज की आधारशिला वेदों पर आधारित थी इसीलिए महर्षि दयानंद ने उस आधारशिला को दोबारा से स्थापित करने के लिए आर्य समाज की स्थापना की ताकि वेदों की महत्ता समाज में बतलाई जा सके।

आर्य समाज वेदों में लिखी शिक्षा और बातों को मानते थे और सभी को वेदों में लिखित शिक्षा का ज्ञान देते थे। आर्य समाज के लोग ज्योतिष, जादू टोना, श्राद्ध, तर्पण, मूर्ति पूजा, देवी पूजा, भूत प्रेत, जागरण, तीर्थ यात्रा आदि मान्यताओं को नकारते थे।

आर्य समाज के नियम

आर्य समाज सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के लिए निम्नलिखित नियमों को‌ अपनाता था और समाज को शिक्षा देता था अतः यह नियम इस प्रकार है-:

  • आर्य मुताबिक सत्य और विद्या ही मूलाधार और परमेश्वर का रूप है।
  • ईश्वर ही सत्य, निराकारवादी, दयालुता, अनंत, सर्वेश्वर, पवित्र और अमर है। इसीलिए ईश्वर की उपासना करना ही परम धर्म है।
  • वेद ही सत्य आधारित पुस्तक है और वेद से प्राप्त शिक्षा को ग्रहण करना और वेद से संबंधित ज्ञान लोगों तक पहुंचाना ही आर्यों का परम धर्म है।
  • सत्य को ग्रहण करना और असत्य को त्यागना सर्वोपरि है।
  • सभी कार्यों को वेद एवं सच और झूठ की सत्यता के बाद ही करना चाहिए।
  • शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति कर ईश्वर को इस संसार के लिए धन्यवाद करना और इस समाज में अपना योगदान देना सर्वोपरि है।
  • समाज के सभी लोगों से स्नेह, धर्म के अनुसार तथा योग्य रूपी व्यवहार करना चाहिए।
  • अंधविश्वास तथा अविद्या से जन्मे तत्वों को त्यागना चाहिए और विद्या को ग्रहण करना चाहिए।
  • केवल अपनी सफलता उन्नति की कामना ना करे बल्कि अन्य लोगो और समाज की उन्नति की भी कामना करें।
  • समाज के लिए लाभकारी तत्वों को सभी मनुष्य को अपनाना चाहिए।

लोकप्रिय आर्य समाजी

जब भी आर्य समाज की बात आती है तो सबसे पहले दयानंद सरस्वती का नाम लिया जाता है परंतु दयानंद सरस्वती के अलावा भी अन्य लोकप्रिय आर्य समाजी जैसे स्वामी श्रद्धानंद, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय, भाई परमानंद, पंडित गुरुदत्त, स्वामी आनंदबोध सरस्वती, स्वामी अछूतानंद, चौधरी चरण सिंह, पंडित वंदे मातरम रामचंद्र राव, बाबा रामदेव आदि का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है।

आर्य समाज का समाज कुरीतियों नष्ट करने और समाज की उन्नति में योगदान

आर्य समाज में निम्नलिखित प्रकार से सामाजिक कुरीतियों को नष्ट कर समाज की उन्नति में अपना योगदान दिया है-:

  • आर्य समाज शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना और समाज सुधार पर आधारित आंदोलन है। आर्य समाज के 85% समर्थकों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सेनानियों के रूप में अपना योगदान दिया था। स्वदेशी आंदोलन का मूल आधार आर्य समाज द्वारा ही जागृत हुआ था।
  • आजादी के बाद एवं भारत के विभाजन के बाद धर्म परिवर्तन का शिकार हुए हिंदुओं को मुस्लिम धर्म से दोबारा हिंदू धर्म में प्रवेश करने के अवसर प्राप्त हुए और शुद्धि आंदोलन का आरंभ हुआ।
  • साल 1886 में दयानंद सरस्वती के अनुयाई लाला हंसराज ने दयानंद एंग्लो कॉलेज वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
  • आर्य समाज के अनुयायी द्वारा स्वामी श्रद्धानंद ने साल 1901, कांगड़ी में गुरुकुल विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।
  • “नमस्ते” को आदर सत्कार एवं अभिवादन के रूप में एक महत्वपूर्ण भारतीय परंपरा के अनुसार अपनाया गया। ‌ आर्यों द्वारा नमस्ते द्वारा आदर सत्कार करने पर जोर दिया गया और आर्यों की किसी भी सभा में या मेल मिलाप में नमस्ते के द्वारा ही अतिथियों का स्वागत किया जाता था। यह अब एक भारतीय परंपरा बन चुकी है। जिसे विदेशी लोग भी भली प्रकार जानते हैं।

महिलाओं के हित में आर्य समाज का योगदान

आर्य समाज समाज में फैली कुरीतियों को खत्म करने के लिए ही जाना जाता था और इतिहास से ही महिलाओं के प्रति कई कुरीतियां समाज में फैली हुई थी जिसे आर्य समाज ने खत्म करना चाहा। आर्य समाज का महिलाओं के हित में सबसे पहला उद्देश्य लड़का और लड़की को सामान दर्जा देना था जिसके लिए उन्होंने कोई आंदोलन चलाया और समाज में यह बात फैलाई।

इसके अलावा विधवा को अभिशाप मानना, दहेज प्रथा, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, महिला को वैश्य तथा दासियों का दर्जा देना आदि कुरीतियों को खत्म करने के लिए लोगों तथा समाज में जागरूकता लाई। धीरे-धीरे करके लोगों में परिवर्तन आया और सती प्रथा तथा दासिया रखना आदि प्रभाव को खत्म कर दिया गया। विधवा को अभिशाप माना और पर्दा प्रथा कुछ हद तक अभी भी मौजूद है परंतु वक्त के साथ समाज में सुधार आया है।

निष्कर्ष

इस आर्टिकल में हमने आपको आर्य समाज की स्थापना किसने की और आर्य समाज से संबंधित अन्य जानकारी दी।

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