Satyashodhak Samaj|सत्यशोधक समाज की स्थापना कब हुई ?

Satyashodhak Samaj

आज का हमारा आर्टिकल सत्यशोधक समाज (satyashodhak Samaj) से संबंधित है।

समाज में फैली हुई कुरीतियां समाज के हर तत्व को प्रभावित करती है चाहे वह मनुष्य हो या जीव-जंतु।

परंतु ऐतिहासिक भारत में कई सामाजिक कुरीतियां जैसे जीव हत्या, छूआछूत, जातिगत भेदभाव, सती प्रथा, दहेज़ प्रथा तथा पर्दा प्रथा, धार्मिक आस्थाओं के चलते तांत्रिक प्रथाएं आदि मौजूद थी जिन्हें समय के साथ खत्म करना जरूरी था।‌

इन्हीं धार्मिक तथा सामाजिक प्रथाओं को खत्म करने के लिए कई समाज सुधार आंदोलन चलाए गए इन समाज सुधार आंदोलनों में सत्यशोधक समाज आंदोलन काफी प्रचलित रहा है।

आइए सत्यशोधक समाज के बारे में विस्तार में जानते हैं।

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सत्यशोधक समाज|Satyashodhak Samaj

जब भी समाज सुधार आंदोलनों का नाम लिया जाता है तो सत्यशोधक समाज का नाम मूल रूप से लिया जाता है। सत्यशोधक समाज आंदोलन की स्थापना प्रसिद्ध समाज सुधारक ज्योतिबा फुले ने साल 1873 में की थी। सत्यशोधक समाज आंदोलन का उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में महिला की भागीदारी को बढ़ाना था और महिलाओं के प्रति धार्मिक प्रथाओं एवं सामाजिक प्रथाओं को खत्म करना तथा महिलाओं की आवाज एवं अधिकारों को राज्य सरकार तक पहुंचा कर उनका कल्याण करना था।

ज्योतिबा फुले ने समाज में फैली असमानता, अंधविश्वास, स्त्री संबंधी कड़े कानून तथा प्रथाएं, जाति आधारित प्रथाएं आदि खत्म करने के लिए सत्यशोधक समाज का निर्माण किया। ज्योतिबा फुले ने बचपन से ही जातिगत भेदभाव, धार्मिक विभिन्नताएं,आपसी मतभेद, मानवता का अपमान, स्त्री का अपमान, धार्मिक प्रथाओं को अपनाने के लिए जबरन अधिकार जताना आदि सामाजिक कुरीतियां देखी है इसलिए उन्होंनेे सत्यशोधक समाज के चलते कई शिक्षण संस्थान खोलो और महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया। इन शिक्षण संस्थानों में समानता, भाईचारा, धर्मनिरपेक्षता, मानवता आदि विशेषताओं पर बल दिया जाता था।

सत्यशोधक समाज का उद्देश्य :

सत्यशोधक समाज का उद्देश्य पुरोहित, मूर्ति पूजा, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाएं आदि से नीच जाति और स्त्रियों को मुक्त करना था। इसके अलावा धार्मिक स्थलों जैसे मंदिरों में पुजारियों की आज्ञा के बाद ही प्रवेश करना संबंधी तथ्य को खत्म करना तथा नीच जातियों के लिए शिक्षा को बढ़ावा देना और उनकी बातें सरकार तक पहुंचाना और उन्हें उनका अधिकार दिलाना था। शिक्षण संस्थानों में हर धर्म की विशेषताओं तथा अवगुणों को बतलाया जाना था कि समाज धर्म तथा धर्म ग्रंथ से संबंधित सभी जानकारी प्राप्त कर सकें।

इसके अलावा सामूहिक एकजुटता, महिलाओं को शिक्षित करना तथा महिलाओं को उनके अधिकारी के प्रति जागरूक करना महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है।

ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज का निर्माण इसलिए किया क्योंकि समाज सुधार के संदर्भ में चलाए गए ब्रह्मा समाज और आर्य समाज आंदोलन का उद्देश्य केवल हिंदू धर्म को पुनः स्थापित करना था। परंतु ज्योतिबा फुले का उद्देश्य धर्म की महत्ता को समझने के साथ-साथ समानता और भाईचारे को अपनाना तथा जातिगत रूढ़ियों को भी खत्म करना था क्योंकि इसके बल पर ही संपूर्ण समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों को खत्म किया जा सकता था।

ज्योतिबा फुले के इस प्रयास से पिछड़ी एवं अनुसूचित जाति के लोग बहुत प्रभावित हुए और समय के साथ साथ पूरे महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले को एक अलग पहचान मिली ज्योतिबा फुले के शिक्षा संबंधी प्रयासों से कई बच्चों एवं महिलाओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त हुआ एवं युवाओं को रोजगार की प्राप्ति हुई ज्योतिबा फुले के द्वारा सत्यशोधक समाज के आधार पर जातिगत भेदभाव को कई हद तक खत्म कर दिया गया और सबको समानता का अधिकार मिलने लगा।

ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज आंदोलन को चला रखा और निरंतर शिक्षा एवं महिलाओं के कल्याण तथा सामाजिक कल्याण में अपना योगदान दिया।

निष्कर्ष :

इस आर्टिकल में हमने आपको सत्यशोधक समाज के बारे में जानकारी दी है।

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