Ramayan in Hindi |रामायण की सम्पूर्ण कहानी हिंदी में

आज का हमारा आर्टिकल रामायण ( Ramayan in Hindi) पर आधारित है।

आज हम आपको हिंदू धर्म की पौराणिक और सबसे महत्वपूर्ण कथा रामायण के बारे में जानकारी देंगे।

रामायण हिन्दू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण कथा इसलिए है क्योंकि यह भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन की गाथा है। 

इससे हिंदू धर्म के ऐतिहासिक पहलू और त्योहार जुड़े हैं जो पौराणिक काल से लेकर अब तक हिन्दू धर्म काल के अनुसार हर वर्ष मनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए दशहरा और दीपावली त्योहार रामायण के पहलुओं से इजात हुए है।

Ramayan in Hindiरामायण की कहानी हिंदी में

इस आर्टिकल में हम निम्नलिखित बातों को जानेंगे -:

  • रामायण के रचयिता और रचनाकाल
  • रामायण के काण्ड तथा संक्षेप में रामायण
  • रामायण का महत्व

रामायण के रचयिता और रचनाकाल

रामायण के सबसे पहले रचयिता आदिकाल के कवि महर्षि वाल्मीकि थे जिन्होंने रामायण को संस्कृत भाषा में लिखा था। महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण को छह खंडों जिसे रामायण के काण्ड से जाना जाता है में विभाजित कर रामायण का निर्माण किया था।

रामायण का हिंदी रूपांतरण कवि तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित्र मानस के रूप में किया था। उन्होंने भी रामायण के कांड को हिंदी में परिभाषित किया था।

रचनाकाल

रामायण के रचनाकाल की बात की जाए तो यह त्रेतायुग से संबंध रखती है। कुछ अन्य भारतीयों का मानना है कि यह आज से 600 ईसा पूर्व पहले लिखी गई थी। रामायण के रचनाकाल को लेकर एक सटीक मत अब तक नहीं मिला है।

रामायण के काण्ड तथा संक्षेप में रामायण

रामायण 7 अध्याय में संपूर्ण श्रीराम कथा हैं। इन 7  अध्यायों को रामायण के काण्ड के रूप में जाना जाता है। हिंदू शास्त्र के आधार पर श्री राम को भगवान विष्णु का मानव अवतार कहां जाता है।  आइए रामायण के 7  काण्ड की सहायता से संपूर्ण रामायण को संक्षेप में जानें-:

बालकाण्ड

रामायण के पहले अध्याय बालकाण्ड में भगवान राम के जन्म और बाल जीवन का वर्णन किया गया है। एक राजा हुआ करते थे जिनका नाम दशरथ था और वह अयोध्या नगरी में रहते थे। उनकी तीन पत्नियां थी  कौशल्या सुमित्रा और कैकेयी। राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्ठि यज्ञ गुरु श्री वशिष्ठ के कहने पर करवाया और इस यज्ञ को ऋंगी ऋषि द्वारा पूरा किया गया।

भक्ति भावना से संपूर्ण यज्ञ से प्रसन्न होकर अग्नि देवता प्रकट हुए और राजा दशरथ को हविष्यपात्र ( खीर का पात्र) दिया तथा राजा दशरथ ने इस खीर के पात्र को अपनी तीनों पत्नियों में बराबर बांट दिया खीर के सेवन से तीनों पत्नियों को संतान सुख प्राप्त हुआ और माता कौशल्या ने भगवान राम को, माता कैकेयी ने भगवान भरत तथा माता सुमित्रा ने भगवान लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया।

जब श्री राम और लक्ष्मण बड़े हुए तो विश्वामित्र ने राजा दशरथ से अपने आश्रम की सुरक्षा हेतु राम और लक्ष्मण को साथ ले जाने के लिए आज्ञा मांगी और राजा दशरथ ने आज्ञा दे दी। आज्ञा के पश्चात श्री राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साथ चले गए और श्री राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षस को मार गिराया तथा दूसरी तरफ लक्ष्मण ने राक्षसों की पूरी सेना को ध्वस्त कर दिया।

इसके पश्चात विश्वामित्र को धनुष यज्ञ के लिए जनकपुर के राजा जनक के निमंत्रण आया और विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण के साथ जनकपुर के लिए रवाना हो गए। धनुष यज्ञ के दौरान भगवान राम ने जब धनुष को उठाया तो वह बीच से टूट गया और धनुष यज्ञ में भगवान राम की विजय हुई तथा तत्पश्चात माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम से हो गया।

इसी के साथ गुरू वशिष्ठ ने भरत का विवाह मांडवी से, लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से तथा शत्रुघ्न का विवाह श्रुतकीर्ति से तय कर दिया।

इसी के साथ संक्षेप में बालकाण्ड समाप्त होता है।

अयोध्याकाण्ड

भगवान राम और माता सीता के विवाह के पश्चात राजा दशरथ को भगवान श्री राम का राज्याभिषेक करने की इच्छा जागृत हुई। परंतु मंत्रा यानी कैकेई की दासी ने कैकेई के कान भर दिए और मंत्रा की बात सुनकर के कैकेई ने कोप भवन में स्थान ग्रहण कर लिया तथा जबरा दशरथ को इसकी जानकारी हुई तो वह कैकई को मनाने आए तथा कैकेई ने उन से वरदान मांगा कि वह भरत का राज्याभिषेक किया जाए और श्री राम को 14 साल के लिए वनवास पर भेज दिया जाए।

भगवान राम ने राजा दशरथ और माता कैकेई का हुक्म माना और 14 वर्ष के वनवास पर निकल गए। भगवान श्रीराम के साथ माता सीता और भगवान लक्ष्मण भी चल दिए।वनवास के दौरान श्री राम सीता और लक्ष्मण ऋंगवेरपुर पहुंचे और वहां पर निषादराज गुह नामक प्रशंसक ने तीनों की सहायता और सेवा की।

इसके बाद भगवान राम प्रयागराज पहुंचे और वहां पर भारद्वाज मुनि से मिले। इसके पश्चात भगवान राम ने यमुना में स्नान किया और वाल्मीकि ऋषि के आश्रम की ओर चल दिए। आश्रम में कुछ वक्त करने के बाद तीनों चित्रकूट की ओर चले गए और स्थान ग्रहण किया।

दूसरी और अपने सुपुत्र श्री राम के वनवास पर चले जाने से राजा दशरथ का निधन हो गया। इसी के अनुसार गुरु वशिष्ठ ने भरत और शत्रुघ्न को ननिहाल से वापस आने का संदेश दिया। भरत ने अपनी माता कैकेई के वरदान की काफी अवहेलना की और दुख जताया। केकई को भी अपनी बात पर पछतावा हुआ।

भरत ने अयोध्या के राज्य को अस्वीकार दिया और भगवान श्री राम को वापस अयोध्या लाने के लिए सभी अयोध्यावासी और संबंधियों को संदेश दिया। भरत ने स्वयं इस प्रस्ताव को चित्रकूट तक पहुंचाया परंतु अपने पिता दशरथ की आज्ञा और वनवास के अनुसार भगवान श्री राम ने अयोध्या वापसी का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया।

परंतु भरत ने अयोध्या वापसी लौटते समय श्री राम की खड़ाऊ ( चप्पल) को अपने साथ ले गए और अयोध्या राज्य के सिंहासन पर उसे विराजित कर दिया और भगवान भरत स्वयं नंदीग्राम में निवास करने के लिए चल दिए।

अरण्यकाण्ड

भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने कुछ समय चित्रकूट में वक्त आने के बाद अत्रि ऋषि के आश्रम में पलायन करने का फैसला किया। ऋषि अत्री ने माता सीता को राम की स्तुति के और उनकी पत्नी अनसूया ने पतिव्रता धर्म की महत्ता को समझाया। अत्रि ऋषि के आश्रम से निकलकर भगवान श्रीराम ने शरभंग मुनि से मुलाकात की।

शरभंग मुनि संपूर्ण जीवन भगवान राम के दर्शन की उपासना करते रहे और जब भगवान राम उनके सामने स्वयं प्रकट हुए तो उन्होंने अपनी अभिलाषा पूर्ण होने के पश्चात स्वयं को अग्नि के हवाले कर दिया और ब्रह्मालोक को प्यारे हो गए।

भगवान श्रीराम उसी दिशा में आगे चल दिए और उन्हें पूरी दिशा में अपने मुनियों के शरीर की हड्डियां रास्ते में मिलती रही और मौजूद मुनियों ने बताया कि राक्षसों ने मुनियों को खा लिया है और यह उन्हीं की हड्डियां है तभी भगवान श्रीराम ने यह प्रतिज्ञा लिखी वह सभी राक्षसों को नष्ट कर देंगे और पृथ्वी को राक्षसों से मुक्ति दिलाएंगे।

भगवान राम ऋषि-मुनियों से भेंट के बाद आगे बढ़े और सुतीक्ष्ण और अगस्त्य ऋषि से मिलाप किया। इसके बाद इसी दिशा में दंडक वन की और प्रवेश करते चले गए और उनका मिलाप जटायु से हुआ। इसके बाद भगवान राम ने पंचवटी को अपना निवास स्थान माना और स्थान ग्रहण किया।

पंचवटी में भगवान राम की मुलाकात रावण की बहन सुपनखा से हुई। शूर्पणखा ने भगवान राम से निवेदन किया परंतु भगवान राम ने बताया कि वह अपनी पत्नी के साथ आए हैं और उन्होंने उसे लक्ष्मण के पास जाने को कहा लक्ष्मण के पास जाकर शूर्पणखा ने फिर से निवेदन किया परंतु रावण यानी शत्रु की बहन जानकर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी।

लक्ष्मण के इस दुर्व्यवहार से क्रोधित होकर शूर्पणखा ने खर दूषण से सहायता की मांग करी और लक्ष्मण से लड़ने को कहा युद्ध के दौरान लक्ष्मण ने खर दूषण को पराजित कर उसका वध कर दिया। तत्पश्चात शूर्पणखा ने अपने भाई रावण से शिकायत की और रावण ने षड्यंत्र रचकर मारिच को स्वर्ण मृग बनाकर पंचवटी श्री राम के स्थान पर भेजा स्वर्ण मृग को देखकर श्रीराम उसके शिकार के लिए वन की ओर निकल गए तथा लक्ष्मण को माता सीता की रक्षा के लिए आदेश दिया।

जब भगवान राम ने स्वर्ण का वध किया तो उसने षड्यंत्र अनुसार आह! लक्ष्मण जैसी आवाज निकाली। इस आवाज को सुनकर माता सीता ने तुरंत लक्ष्मण को वन की ओर जाने को कहा परंतु वन की और जाने से पहले लक्ष्मण ने आश्रम के बाहर एक सीधी रेखा खींच दी और माता सीता को उसे पार ना करने की सलाह दी।

लक्ष्मण के वन की ओर जाते ही रावण ने साधु का रूप धारण किया और आश्रम की ओर आया। रावण ने भूखे एवं अशुद्ध बुद्धू होने का ढोंग किया और सीता से जल की मांग की। सीता ने मानव धर्म के अनुसार लक्ष्मण रेखा को पार कर दिया और लक्ष्मण रेखा के पार आते ही रावण ने अपना असली रूप धारण कर लिया और सीता को हरण कर अपने लंका की ओर ले जाने लगा रावण ने सीता का हरण कर लिया है।

यह देखकर जटायु रावण के पीछे गया परंतु रावण ने अपनी तलवार से जटायु के पंखों की ओर तेजी से वार किया और पंख के कटने से जटायु धरती पर आ गिरा।

सीता को स्थान पर ना देखकर भगवान राम बहुत दुखी हो गए और उन्हें ढूंढने निकल गए। वह जिस दिशा में सीता को ढूंढने निकले वहां पर जटायु असहाय अवस्था में धरती पर पड़ा मिला और उसने रावण द्वारा अपने साथ हुए दुर्व्यवहार और सीता को हरण कर ले जाने की सारी परिस्थिति भगवान राम को बताई और कहा कि वह सीता माता को दक्षिण दिशा की ओर ले कर गया है।

संपूर्ण परिस्थिति बताने के पश्चात जटायु ने अपने प्राण त्याग दिए और भगवान राम ने उनका अंतिम संस्कार किया और वह सघन वन की ओर चल पड़े। सघन वन में आगे बढ़ते हुए उन्होंने दुर्वासा द्वारा दिए गए श्राप के अनुसार राक्षस रूपी गन्धर्व कबंध का विनाश किया। इस तरह राम सीता माता की खोज में सघन वन में आगे बढ़ते चले गए।

किष्किन्धाकाण्ड

सघन वन में आगे बढ़ते चलने के बाद राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर आ गए। ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव और उसके मंत्री का निवास स्थान था। राम और लक्ष्मण को ऋषि मुख पर्वत पर देखकर सुग्रीव को यह आशंका हुई कि कहीं इन दो पुरुषों को उनके भाई बाली ने हमला करने के लिए तो नहीं भेजा इसीलिए सुग्रीव ने हनुमान को ब्राह्मण के रूप में राम और लक्ष्मण के पास जाने को कहा जब हनुमान जी ने राम और लक्ष्मण से भेंट की तो उन्हें ज्ञात हुआ कि यह शत्रु नहीं है और उन्होंने सुग्रीव से राम और लक्ष्मण की भेंट करा दी।

सुग्रीव ने राम को आश्वासन दिया कि सीता माता जल्द ही मिल जाएगी इसके पश्चात सुग्रीव ने भगवान राम को उनके भाई बाली द्वारा किए गए अत्याचार की कथा सुनाई भगवान राम ने बाली का वध करने का फैसला किया और तत्पश्चात उन्होंने एक लड़ाई के दौरान बाली का वध कर दिया। इसके फलस्वरूप भगवान राम ने किष्किंधा का राज्य सुग्रीव को सौंप दिया और बाली के पुत्र अंगद को युवराज का पद भार सौंप दिया।

किष्किंधा राज्य सिंहासन पर विराजमान होने के पश्चात सुग्रीव ने वानरों को सीता माता की खोज के लिए जंगल की ओर भेजा। वानरों ने खोज के लिए गुफा में प्रवेश किया जहां उन्हें एक तपस्विनी मिली तथा इस तपस्विनी ने अपनी योग शक्ति द्वारा पूरी वानर सेना को समुद्र तट के पार पहुंचा दिया यहां पर वानर सेना को संपाती मिली और उसने यह बताया कि रावण ने सीता माता को उसकी लंका अशोक वाटिका में रखा हुआ है। तत्पश्चात हनुमान जी ने लंका की ओर जाने का फैसला किया।

सुन्दरकाण्ड

संपाती से मिली जानकारी के आधार पर हनुमान जी ने लंका की ओर अग्रसर होने के लिए प्रस्थान किया। बीच दिशा में सुरसा ने उनकी एक परीक्षा ली और उस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात बलवान, सामर्थ्य तथा योग्य होने का आशीर्वाद देकर लंका की ओर अग्रसर होने का रास्ता दिया। लंका के ऊपर से हनुमान जी की छाया देखकर राक्षसी सामने आई जिसका वध हनुमान जी ने किया और उन्होंने लंका की ओर प्रवेश किया। 

यहां पर हनुमान जी की भेंट विभीषण से हुई। जब हनुमान जी ने अशोक वाटिका की और प्रवेश किया तो उन्होंने देखा कि रावण माता सीता को क्रोधित होकर धमका रहा था। वहां पर उपस्थित दासी ने रावण की जाने के पश्चात सीता को आश्वासन दिया कि सब ठीक हो जाएगा माता सीता को जैसे ही एकांत में देखा हनुमान जी उनकी और चल दिए और उन्हें राम जी की मुद्रिका उन्हें सौंप दी और कहा कि भगवान राम उन्हें रहने अवश्य ही आएंगे।

हनुमान जी और रावण के पुत्र अक्षय कुमार में अशोक वाटिका में भिड़ंत हुई और हनुमान जी ने अक्षय कुमार को मार गिराया। रावण के भाई मेघनाथ ने हनुमान जी को बांधकर रावण के दरबार में प्रवेश किया। रावण के पूछे जाने पर हनुमान जी ने अपना परिचय श्री राम के शुभ चिंतक के रूप में दिया। रावण के आदेश अनुसार हनुमान जी की पूंछ में बहुत सारे कपड़े बांधे गए और कपड़ों को तेल में डूबा कर उनकी पूंछ में आग लगा दी गई तत्पश्चात हनुमान जी ने पूरी लंका को उस आग से जलाकर लंका का दहन कर दिया।

अंत में हनुमान जी माता सीता के पास लौटे और विदाई के वक्त माता सीता ने अपनी चूड़ामणि देकर हनुमान जी को अलविदा कहा हनुमान जी लंका से निकल वापस समुद्र की ओर आए और अपने समस्त वानर सेना के साथ सुग्रीव निवास स्थान पर चल दिए। हनुमान के लंका दहन करने तथा माता सीता तक संदेश पहुंचाने के कारण भगवान राम उनसे बहुत प्रसन्न हुए।

दूसरी तरफ विभीषण ने रावण को यह सलाह दी कि वह राम से शत्रुता ना करें परंतु रावण ने विभीषण की बात ना माने और उसे अपमानित करके लंका से अलग कर दिया। लंका से अलग होने के पश्चात विभीषण भगवान राम की शरण में आ गए और उन्होंने रावण से सीता माता को छुड़ाने के लिए सहायता का आश्वासन दिया। लंका समुद्र के पार थी इसीलिए राम ने समुद्र से विनती की ताकि समुद्र रास्ता दे और वह लंका की ओर जा सके परंतु समुद्र ने रास्ता नहीं दिया और जब भगवान राम ने क्रोध किया तो उनके क्रोध से समुद्र डर कर उन्हें नल और नील द्वारा रास्ता बना कर लंका की ओर जाने का सुझाव दिया।

लंकाकाण्ड (युद्धकाण्ड)

समुद्र के सुझाव अनुसार नल नील तथा वानर सेना के सहायता से पुल का निर्माण किया गया। श्री राम ने पुल निर्माण के पश्चात रामेश्वरम की स्थापना कर भगवान शंकर की आराधना और पूजा की तथा समुद्र पार कर लंका की ओर निकल पड़े। समुद्र पार करने के पश्चात भगवान राम ने स्थान ग्रहण कर लिया रावण को पुल निर्माण और भगवान राम के समुद्र पार स्थान ग्रहण करने का संदेश मिला और वह व्याकुल हो उठा। दूसरी तरफ मंदोदरी ने भी रावण को समझाया कि वह राम से शत्रुता ना करें परंतु रावण नहीं माना।

भगवान राम अपनी वाणी सेना के साथ सुबेल पर्वत पर विराजमान हो गए। भगवान राम ने अंगद को लंका की ओर भेजा। अंगद ने रावण के दरबार में प्रवेश होकर कहा कि भगवान राम ने उन्हें अपनी शरण में आने को कहा है परंतु रावण ने यह संदेश  अस्वीकार कर दिया।

भगवान राम द्वारा अहिंसात्मक प्रयास द्वारा रावण के नाम आने पर युद्ध का आरंभ हुआ।

युद्ध में लक्ष्मण और मेघनाथ के बीच धनुष बाणों  का वार एक दूसरे पर जोरदार हुआ। कुछ समय एक दूसरे पर धनुष बाण छोड़ने के पश्चात मेघनाथ के बाण लक्ष्मण को घायल कर गए। लक्ष्मण बाण के वार से मूर्छित होकर धरती पर गिर गए और तत्पश्चात हनुमान जी ने सुषेण वैद्य जी को लक्ष्मण के उपचार के लिए बुलाया और वैद्य जी ने संजीवनी से औषधि लाने का आदेश दिया।

हनुमान जी संजीवनी लेने के लिए रवाना हो गए और दूसरी तरफ गुप्त सूत्रों से रावण को यह बात ज्ञात हो गई और इसलिए हनुमान के मार्ग में बाधा लाने के लिए उन्होंने एक राक्षसी को भेजा जिसे हनुमान जी ने नष्ट किया और हनुमान जी को सही औषधि का ज्ञान ना होने के कारण संपूर्ण संजीवनी पर्वत को उठा लिया और समय पर संजीवनी औषधि को सुषेण वैद्य को सौंप दिया तथा लक्ष्मण जी को होश आ गया।

असफल प्रयासों के पश्चात रावण ने कुंभकरण को राम से लड़ने का आदेश दिया परंतु कुंभकर्ण ने भी रावण को राम से शत्रुता ना निभाने की सलाह दी लेकिन युद्ध के दौरान भगवान राम ने कुंभकरण को नष्ट कर दिया। भगवान राम और लक्ष्मण ने मिलकर रामायण के दो भाई कुंभकरण और मेघनाथ का वध कर दिया था। आखिर में रावण और भगवान श्री राम के बीच युद्ध हुआ जिसके फलस्वरुप भगवान राम ने रावण का वध पर विजय प्राप्त की।

युद्ध समाप्ति के बाद भगवान राम ने विभीषण को लंका का सिंहासन सौंप दिया और सीता एवं लक्ष्मण के साथ अयोध्या की ओर अग्रसर हुए।

उत्तरकाण्ड

भगवान राम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या में प्रवेश किया और भावयुक्त भरत और अयोध्या वासियों ने उनका स्वागत किया। भगवान श्री राम का राज्याभिषेक किया गया। राजयाभिषेक के पश्चात अयोध्या के राजा भगवान राम बने। अयोध्या एक आदर्श नगरी बन गई। कुछ समय बाद भगवान राम के 2 पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ। लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न के भी दो पुत्र हैं।

जिस दिन भगवान राम अयोध्या वापस लौटे तो अयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाए और एक त्यौहार की तरह उत्सव मनाया गया तथा हिंदू धर्म में इस उत्सव को दीपावली के नाम से जाना जाता है।

रामायण का महत्व

रामायण का हर मनुष्य के जीवन में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि रामायण से मिलने वाली सीख जीवन में आने वाली हर परिस्थिति तथा व्यक्तित्व के लिए प्रेरणादायक है।

उदाहरण के लिए जिस प्रकार भगवान राम ने अपने पिता दशरथ की आज्ञा का पालन कर 14 वर्ष का वनवास काटा और यह सिद्ध किया कि माता-पिता की आज्ञा का पालन करना संतान का सर्वोत्तम धर्म होता है।

रावण जैसे वेदों का ज्ञान रखने वाले ज्ञानी का केवल उसके अभिमान के कारण वध होना यह सिद्ध करता है कि अभिमान व्यक्ति के लिए बहुत हानिकारक है और अभिमान का अंत मौत या अत्यंत दुष्ट परिणाम होता है।

भरत द्वारा अयोध्या राज्यों को अस्वीकार करने तथा राम की खड़ाऊ को अयोध्या के सिंहासन पर विराजित करने से यह सिद्ध होता है कि अपनों के प्रति प्रेम भाव और आदर सदैव रखना चाहिए।

निष्कर्ष

देखा दोस्तों हमने किस तरह सरल भाषा में आपको रामायण के 7 अध्यायों ( रामायण काण्ड)  की सहायता से संक्षेप में रामायण का सार समझाने का प्रयत्न किया।

ऐसे ही धार्मिक कथाओं का सरल रूपांतरण जानने के लिए हमारे वेब पोर्टल को फॉलो करें।

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